रूद्र द्वारा स्तुति

राजा पृथु के प्रपौत्र प्राचीनबर्हि ने ब्रह्माजी के कहने से समुद्र की कन्या शतद्रुति से विवाह किया था। शतद्रुति के गर्भ से प्राचीनबर्हि के प्रचेता नाम के दस पुत्र हुए। वे सब बड़े ही धर्मज्ञ तथा एक से नाम और आचरणवाले थे। पिता द्वारा सन्तानोत्पत्ति का आदेश दिये जाने पर वे सब तपस्या करते हुए श्रीहरि की आराधना की। घर से तपस्या करने के लिए जाते समय मार्ग में श्री महादेवजी ने उन्हें दर्शन देकर कृपापूर्वक उपदेश दिया और स्तोत्र सुनाया। वह नारायण-परायण करूणार्द्रहृदय भगवान रूद्र द्वारा की गयी श्रीहरि की पवित्र, मंगलमयी एवं कल्याणकारी स्तुति इस प्रकार से हैः
'भगवन् ! आपका उत्कर्ष उच्चकोटि के आत्मज्ञानियों के कल्याण के लिए, निजानन्द लाभ के लिए है, उससे मेरा भी कल्याण हो। आप सर्वदा अपने निरतिशय परमानंद-स्वरूप में ही स्थित रहते हैं, ऐसे सर्वात्मक आत्मस्वरूप आपको नमस्कार है। आप पद्मनाभ (समस्त लोकों के आदिकारण) हैं; भूतसूक्ष्म (तन्मात्र) और इन्द्रियों के नियंता, शांत, एकरस और स्वयंप्रकाश वासुदेव (चित्त के अधिष्ठाता) भी आप ही हैं;आपको नमस्कार है। आप ही सूक्ष्म (अव्यक्त), अनन्त और मुखाग्नि के द्वारा सम्पूर्ण लोकों का संहार करने वाले अहंकार के अधिष्ठाता संकर्षण तथा जगत के प्रवृष्ट ज्ञान के उदगमस्थान बुद्धि के अधिष्ठाता प्रद्युम्न हैं, आपको नमस्कार है। आप ही इन्द्रियों के स्वामी, मनस्तत्त्व के अधिष्ठाता भगवान अनिरुद्ध हैं; आपको बार-बार नमस्कार है। आप अपने तेज से जगत को व्याप्त करने वाले सूर्यदेव हैं, पूर्ण होने के कारण आपमें वृद्धि और क्षय नहीं होता; आपको नमस्कार है। आप स्वर्ग और मोक्ष के द्वार तथा निरंतर पवित्र हृदय में रहने वाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही सुवर्णरूप वीर्य से युक्त और चातुर्होत्र कर्म के साधन तथा विस्तार करने वाले अग्निदेव हैं; आपको नमस्कार है। आप पितर और देवताओं के पोषक सोम हैं तथा तीनों वेदों के अधिष्ठाता हैं; हम आपको नमस्कार करते हैं। आप ही समस्त प्राणियों को तृप्त करने वाले सर्वरस (जल) रूप हैं;आपको नमस्कार है। आप समस्त प्राणियों के देह, पृथ्वी और विराटस्वरूप हैं तथा त्रिलोकी की रक्षा करने वाले मानसिक, ऐंद्रिय और शारीरिक गुण शब्द के द्वारा समस्त पदार्थों का ज्ञान कराने वाले तथा बाहर-भीतर का भेद करने वाले आकाश हैं तथा आप ही महान पुण्यों से प्राप्त होने वाले परम तेजोमय स्वर्ग-वैकुण्ठादि लोक हैं; आपको पुनः-पुनः नमस्कार है। आप पितृलोक की प्राप्ति कराने वाले प्रवृत्ति-कर्मरूप और देवलोक की प्राप्ति के साधन निवृत्ति-कर्मरूप हैं तथा आप ही अधर्म के फलस्वरूप दुःखदायक मृत्यु हैं; आपको नमस्कार है। नाथ ! आप ही पुराणपुरुष तथा सांख्य और योग के अधीश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं, आप सब प्रकार की कामनाओं की पूर्ति के कारण, साक्षात् मंत्रमूर्ति और महान धर्मस्वरूप हैं; आपकी ज्ञानशक्ति किसी भी प्रकार कुण्ठित होने वाली नहीं है, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप ही कर्ता, करण और कर्म इन तीनों शक्तियों के एकमात्र आश्रय हैं; आप ही अहंकार के अधिष्ठाता रूद्र हैं; आप ही ज्ञान और क्रियास्वरूप हैं तथा आपसे ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी इन चार प्रकार की वाणिओं की अभिव्यक्ति होती है;आपको नमस्कार है।
प्रभो ! हमें आपके दर्शनों की अभिलाषा है, अतः आपके भक्तजन जिसका पूजन करते हैं और जो आपके निज जनों को अत्यंत प्रिय है अपने उस अनूप रूप की आप हमें झाँकी कराइये। आपका वह रूप अपने गुणों से समस्त इन्द्रियों को तृप्त करने वाला है। वह वर्षाकालीन मेघ के समान स्निग्ध, श्याम और सम्पूर्ण सौन्दर्यों का सार-सर्वस्व है। सुन्दर चार विशाल भुजाएँ महामनोहर मुखारविन्द, कमल-दल के समान नेत्र, सुन्दर भौंहे सुघड़ नासिका, मनमोहिनी दंतपंक्ति, अमोल कपोलयुक्त मनोहर शोभाशाली समान कर्ण-युगल हैं। प्रीतिपूर्ण उन्मुक्त हास्य तिरछी चितवन, काली-काली घुँघराली अलकें, कमलकुसुम की समान फहराता हुआ पीताम्बर, झिलमिलाते हुए कुण्डल, चमचमाते हुए मुकुट, कंगन (कंकण), हार, नूपुर और मेखला आदि विचित्र आभूषण तथा शंख, चक्र, गदा, पद्म, वनमाला और कौस्तुभ मणि के कारण उसकी अपूर्व शोभा है। उसके सिंह के समान स्थूल कंधे हैं, जिन पर हार, केयूर एवं कुण्डलादि की कांति झिलमिलाती रहती है, तथा कौस्तुभ मणि की कांति से सुशोभित मनोहर ग्रीवा है। उसका श्यामल वक्षःस्थल श्रीवत्स चिह्न के रूप में लक्ष्मी जी का नित्य निवास होने के कारण कसौटी की शोभा को भी मात करता है। उसका त्रिवली से सुशोभित पीपल के पत्ते के समान सुडौल उदर श्वास के आने-जाने से हिलता हुआ बड़ा ही मनोहर जान पड़ता है। उसमें जो भँवर के समान चक्करदार नाभि है, वह इतनी गहरी है कि उससे उत्पन्न हुआ यह विश्व मानों, फिर उसी में लीन होना चाहता है। श्याम वर्ण कटिभाग में पीताम्बर और सुवर्ण की मेखला शोभायमान है। समान और सुन्दर चरण, पिंडली, जाँघ और घुटनों के कारण आपका दिव्य विग्रह बड़ा ही सुघड़ जान पड़ता है। आपके चरणकमलों की शोभा शरद् ऋतु के कमलदल की कांति का भी तिरस्कार करती है। उनके नखों से जो प्रकाश निकलता है, वह जीवों के हृदयान्धकार को तत्काल नष्ट कर देता है। हमें आप कृपा करके भक्तों के भयहारी एवं आश्रयस्वरूप उसी रूप का दर्शन कराइये। जगदगुरो ! हम अज्ञानावृत प्राणियों को अपनी प्राप्ति का मार्ग बतलानेवाले आप ही हमारे गुरु हैं। 
एतद्रूपमनुध्येयमात्म शुद्धिमभीप्सताम्।
यद् भक्तियोगोऽभयदः स्वधर्मनुतिष्ठताम्।।
भवान् भक्तिमता लभ्यो दुर्लभः सर्वदेहिनाम्।
स्वाराज्यस्याप्यभिमत एकान्तेनात्मविदगतिः।।
प्रभो ! चित्तशुद्धि की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को आपके इस रूप का निरंतर ध्यान करना चाहिए, इसकी भक्ति ही स्वधर्म का पालन करने वाले पुरुष को अभय करने वाली है। स्वर्ग का शासन करने वाला इन्द्र भी आपको ही पाना चाहता है तथा विशुद्ध आत्मज्ञानियों की गति भी आप ही हैं। इस प्रकार आप सभी देहधारियों के लिए अत्यंत दुर्लभ हैं; केवल भक्तिमान पुरुष ही आपको पा सकते हैं।
(श्रीमद् भागवतः 4.24.53.54)
सत्पुरुषों के लिए भी दुर्लभ अनन्य भक्ति से भगवान को प्रसन्न करके, जिनकी प्रसन्नता किसी अन्य साधना से दुःसाध्य है, ऐसा कौन होगा जो उनके चरणतल के अतिरिक्त और कुछ चाहेगा। जो काल अपने अदम्य उत्साह और पराक्रम से फड़कती हुए भौंह के इशारे से सारे संसार का संहार कर डालता है, वह भी आपके चरणों की शरण में गये हुए प्राणी पर अपना अधिकार नहीं मानता। ऐसे भगवान के प्रेमी भक्तों का यदि आधे क्षण के लिए भी समागम हो जाय तो उसके सामने मैं स्वर्ग और मोक्ष को कुछ नहीं समझता; फिर मर्त्यलोक के तुच्छ भोगों की तो बात ही क्या है। प्रभो ! आपके चरण सम्पूर्ण पापराशि को हर लेने वाले हैं। हम तो केवल यही चाहते हैं कि जिन लोगों ने आपकी कीर्ति और तीर्थ (गंगाजी) में आन्तरिक और बाह्य स्नान करके मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के पापों को धो डाला है तथा जो जीवों के प्रति दया, राग-द्वेषरहित चित्त तथा सरलता आदि गुणों से युक्त हैं, उन आपके भक्तजनों का संग हमें सदा प्राप्त होता रहे। यही हम पर आपकी बड़ी कृपा होगी। जिस साधक का चित्त भक्तियोग से अनुगृहीत एवं विशुद्ध होकर न तो बाह्य विषयों में भटकता है और न अज्ञान-गुहारूप प्रकृति में ही लीन होता है, वह अनायास ही आपके स्वरूप का दर्शन पा जाता है। जिसमें यह सारा जगत दिखायी देता है और जो स्वयं सम्पूर्ण जगत में भास रहा है, वह आकाश के समान विस्तृत और परम प्रकाशमय ब्रह्मतत्त्व आप ही हैं।
भगवान ! आपकी माया अनेक प्रकार के रूप धारण करती है। इसी के द्वारा आप इस प्रकार जगत की रचना, पालन और संहार करते हैं जैसे यह कोई सद वस्तु हो। किंतु इससे आपमें किसी प्रकार का विकार नहीं आता। माया के कारण दूसरे लोगों में ही भेदबुद्धि उत्पन्न होती है, आप परमात्मा पर वह अपना प्रभाव डालने में असमर्थ होती है। आपको ते हम परम स्वतन्त्र ही समझते हैं। आपका स्वरूप पंचभूत, इन्द्रिय और अंतःकरण के प्रेरक रूप से उपलक्षित होता है। जो कर्मयोगी पुरुष सिद्धि प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के कर्मों द्वारा आपके इस सगुण, साकारस्वरूप का श्रद्धापूर्वक भलीभाँति पूजन करते हैं, वे ही वेद और शास्त्रों के सच्चे मर्मज्ञ हैं। प्रभो !  आप ही अद्वितीय आदिपुरुष हैं। सृष्टि के पूर्व आपकी मायाशक्ति सोयी रहती है। फिर उसी के द्वारा सत्त्व, रज और तमरूप गुणों का भेद होता है और इसके बाद उन्हीं गुणों से महत्तत्त्व, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, देवता, ऋषि और समस्त प्राणियों से युक्त इस जगत की उत्पत्ति होती है। 
फिर आप अपनी मायाशक्ति से रचे हुए इन जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उदभिज्ज भेद से चार प्रकार मधुमक्खियाँ अपने ही उत्पन्न किये हुए मधु का आस्वादन करती हैं, उसी प्रकार वह आपका अंश उन शरीरों में रहकर इन्द्रियों के द्वारा इन तुच्छ विषयों को भोगता है। आपके उस अंश को ही पुरुष या जीव कहते हैं।
प्रभो ! आपका तत्त्वज्ञान प्रत्यक्ष से नहीं, अनुमान से होता है। प्रलयकाल उपस्थित होने पर कालस्वरूप आप ही अपने प्रचण्ड एवं असह्य वेग से पृथ्वी आदि भूतों को अन्य भूतों से विचलित कराकर समस्त लोकों का संहार कर देते हैं। जैसे वायु अपने असहनीय एवं प्रचण्ड झोंकों से मेघों के द्वारा ही मेघों को तितर-बितर करके नष्ट कर डालती है। भगवन् ! यह मोहग्रस्त जीव प्रमादवश हर समय इसी चिंता में रहता है कि 'अमुक कार्य करना है।' इसका लोभ बढ़ गया है और इसे विषयों की ही लालसा बनी रहती है। किंतु आप सदा ही सजग रहते हैं; भूख से जीभ लपलपाता हुआ सर्प जैसे चूहे को चट कर जाता है, उसी प्रकार आप अपने कालस्वरूप से उसे सहसा लील जाते हैं। आपकी अवहेलना करने के कारण अपनी आयु को व्यर्थ माननेवाला ऐसा कौन विद्वान होगा, जो आपके चरणकमलों को बिसारेगा? इनकी पूजा तो काल की आशंका से ही हमारे पिता ब्रह्माजी और स्वायम्भुव आदि चौदह मनुओं ने भी बिना कोई विचार किये केवल श्रद्धा से ही की थी। ब्रह्मन ! इस प्रकार सारा जगत रूद्ररूप काल के भय से व्याकुल है। अतः परमात्मन् ! इस तत्त्व को जानने वाले हम लोगों के तो इस समय आप ही सर्वथा भयशून्य आश्रय हैं।'
(श्रीमद् भागवतः 4.24.33-68)

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