ध्रुव द्वारा स्तुति
ध्रुव को अपने पिता उत्तानपाद की गोद में बैठने का यत्न करते हुए देख क्रोधित हुई सुरुचि ने जब ध्रुव से ये वचन कहे 'यदि तुझे राजसिंहासन की इच्छा है तो तपस्या करके परम-पुरुष श्रीनारायण की आराधना कर और उनकी कृपा से मेरे गर्भ में आकर जन्म ले।' तब बालक ध्रुव माता सुनीति के यह समझाने पर कि 'जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटने की इच्छा करने वाले मुमुक्षु लोग निरंतर प्रभु के चरणकमलों के मार्ग की खोज किया करते हैं। तू स्वधर्मपालन से पवित्र हुए अपने चित्त में श्रीपुरुषोत्तम भगवान को बिठा ले तथा अन्य सबका चिन्तन छोड़कर केवल उन्हीं का भजन कर। ध्रुव प्रभुप्राप्ति के लिए घर से निकल पड़ते हैं। रास्ते में देवर्षि नारद के मिलने पर वे उनसे 'प्रभु की प्राप्ति कैसे हो?', 'प्रभु का ध्यान कैसे करूँ?' इस प्रकार के प्रश्न पूछते हैं। नारदजी पहले तो उनकी प्रभुभक्ति के प्रति दृढ़ता, तत्परता एवं परिपक्वता की परीक्षा लेते हैं। तदुपरान्त दया के सागर, सर्वाधार भगवान श्रीकृष्ण के सलोने, साँवले स्वरूप का वर्णन कर द्वादशाक्षर मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करने के लिए कहते हैं। बालक ध्रुव नारदजी के उपदेशानुसार अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर एवं प्राणों को रोककर, एकाग्र चित्त व अनन्य बुद्धि से विश्वात्मा श्रीहरि के ध्यान में डूब जाते हैं परंतु जिस समय उन्होंने महदादि सम्पूर्ण तत्वों के आधार तथा प्रकृति और पुरुष के भी अधीश्वर परब्रह्म की धारणा की, उस समय तीनों लोक उनके तेज को न सह सकने के कारण काँप उठे। तीव्र योगाभ्यास से एकाग्र हुई बुद्धि के द्वारा भगवान की बिजली के समान देदीप्यमान जिस मूर्ति का वे अपने हृदयकमल में ध्यान कर रहे थे, वह सहसा विलीन हो गयी। इससे घबराकर उन्होंने ज्यों ही नेत्र खोले कि भगवान के उसी रूप को बाहर अपने सामने खड़ा पाया।
प्रभु के दर्शन पाकर बालक ध्रुव को कुतूहल हुआ, वे प्रेम में अधीर हो गये। उन्होंने पृथ्वी पर दण्ड के समान लोटकर उन्हें प्रणाम किया। फिर वे इस प्रकार प्रेमभरी दृष्टि से उनकी ओर देखने लगे मानों, नेत्रों से उन्हें पी जायेंगे, मुख से चूम लेंगे और भुजाओं में कस लेंगे।
वे हाथ जोड़े प्रभु के सामने खड़े थे और उनकी स्तुति करना चाहते थे, परंतु स्तुति किस प्रकार करें यह नहीं जानते थे। सर्वान्तर्यामी हरि उनके मन की बात जान गये। उन्होंने कृपापूर्वक अपने वेदमय शंख को उनके गाल से छुआ दिया। शंख का स्पर्श होते ही ध्रुव को वेदमयी दिव्य वाणी प्राप्त हो गयी और जीव तथा ब्रह्मा के स्वरूप का भी निश्चय हो गया। वे अत्यंत भक्तिभाव से धैर्यपूर्वक विश्वविख्यात कीर्तिमान श्रीहरि की स्तुति करने लगेः
'प्रभो ! आप सर्वशक्तिसम्पन्न हैं। आप ही मेरे अंतःकरण में प्रवेश कर अपने तेज से मेरी इस सोयी हुई वाणी को सजीव करते हैं तथा हाथ, पैर, कान और त्वचा आदि अन्यान्य इन्द्रियों एवं प्राणों को भी चेतनता देते हैं। मैं आप अंतर्यामी भगवान को प्रणाम करता हूँ।
भगवन् ! आप एक ही हैं, परंतु अपनी अनंत गुणमयी मायाशक्ति से इस महदादि सम्पूर्ण प्रपंच को रचकर अंतर्यामीरूप से उसमें प्रवेश कर जाते हैं और फिर इसके इन्द्रियादि असत् गुणों में उनके अधिष्ठातृ-देवताओं के रूप में स्थित होकर अनेक रूप भासते हैं, ठीक वैसे ही जैसे तरह-तरह की लकड़ियों में प्रकट हुई आग अपनी उपाधियों के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों में भासती है। नाथ ! सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्माजी ने भी आपकी शरण लेकर आपके दिए हुए ज्ञान के प्रभाव से ही इस जगत को सोकर उठे हुए पुरुष के समान देखा था। दीनबंधो ! उन्हीं आपके चरणतल का मुक्त पुरुष भी आश्रय लेते हैं, कोई भी कृतज्ञ पुरुष उन्हें कैसे भूल सकता है?
प्रभो ! इन शवतुल्य शरीरों के द्वारा भोगा जाने वाला, इन्द्रिय और विषयों के संसर्ग से उत्पन्न सुख तो मनुष्यों को नरक में भी मिल सकता है। जो लोग इस विषय सुख के लिए लालायित रहते हैं और जो जन्म मरण के बंधन से छुड़ा देने वाले कल्पतरूस्वरूप आपकी उपासना भगवत्प्राप्ति के सिवाय किसी अन्य उद्देश्य से करते हैं, उनकी वृद्धि अवश्य ही आपकी माया के द्वारा ठगी गयी है। नाथ ! आपके चरणकमलों का ध्यान करने से और आपके भक्तों के पवित्र चरित्र सुनने से प्राणियों को जो आनन्द प्राप्त होता है, वह निजानंदस्वरूप ब्रह्म में भी नहीं मिल सकता। फिर जिन्हें काल की तलवार काट डालती है, उन स्वर्गीय विमानों से गिरने वाले पुरुषों को तो वह सुख मिल ही कैसे सकता है।
भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसंगो भूयादनन्त महताममलाशयानाम्।
येनांजसोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धिं नेष्ये भवद् गुणकथामृतपानमत्तः।।
अनन्त परमात्मन् ! मुझे तो आप उन विशुद्ध हृदय महात्मा भक्तों का संग दीजिए, जिनका आप में अविच्छिन्न भक्तिभाव है, उनके संग में मैं आपके गुणों और लीलाओं की कथा-सुधा को पी-पीकर उन्मत्त हो जाऊँगा और सहज ही इस अनेक प्रकार के दुःखों से पूर्ण भयंकर संसार-सागर के उस पार पहुँच जाऊँगा।
(श्रीमद् भागवतः 4.9.11)
कमलनाथ प्रभो ! जिनका चित्त आपके चरणकमल की सुगंध से लुभाया हुआ है, उन महानुभावों का जो लोग संग करते हैं वे अपने इस अत्यंत प्रिय शरीर और इसके सम्बन्धी पुत्र, मित्र, गृह और स्त्री आदि की सुध भी नहीं लेते। अजन्मा परमेश्वर ! मैं तो पशु, वृक्ष, पर्वत, पक्षी, सरीसृप (सर्पादि रेंगने वाले जंतु), देवता, दैत्य और मनुष्य आदि से परिपूर्ण तथा महदादि अनेकों कारणों से सम्पादित आपके इस सदसदात्मक स्थूल विश्वरूप को ही जानता हूँ; इससे परे जो आपका परम स्वरूप है, जिसमें वाणी की गति नहीं है उसका मुझे पता नहीं है।
भगवन् ! कल्प का अंत होने पर योगनिद्रा में स्थित जो परम पुरुष इस सम्पूर्ण विश्व को अपने उदर में लीन करके शेषजी के साथ उन्हीं की गोद में शयन करते हैं तथा जिनके नाभि-समुद्र से प्रकट हुए सर्वलोकमय सुवर्ण वर्ण कमल से परम तेजोमय ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, वे भगवान आप ही हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।
प्रभो ! आप अपनी अखण्ड चिन्मयी दृष्टि से बुद्धि की सभी अवस्थाओं के साक्षी हैं तथा नित्यमुक्त, शुद्धसत्त्वमय, सर्वज्ञ, परमात्मस्वरूप, निर्विकार, आदिपुरुष, षडैश्वर्य-सम्पन्न एवं तीनों गुणों के अधीश्वर हैं। आप जीव से सर्वथा भिन्न हैं तथा संसार की स्थिति के लिए यज्ञाधिष्ठाता विष्णुरूप से विराजमान हैं।
आपसे ही विद्या-अविद्या आदि विरुद्ध गतियोंवाली अनेकों शक्तियाँ धारावाहिक रूप से निरंतर प्रकट होती रहती हैं। आप जगत के कारण, अखण्ड, अनादि, अनन्त, आनंदमय निर्विकार ब्रह्मस्वरूप हैं। मैं आपकी शरण हूँ। भगवन् ! आप परमानंदमूर्ति हैं, जो लोग ऐसा समझकर निष्कामभाव से आपका निरन्तर भजन करते हैं, उनके लिए राज्यादि भोगों की अपेक्षा आपके चरणकमलों की प्राप्ति ही भजन का सच्चा फल है। स्वामिन् ! यद्यपि बात ऐसी ही है तो भी जैसे गौ अपने तुरंत के जन्मे हुए बछड़े को दूध पिलाती है और व्याघ्रादि से बचाती रहती हैं, उसी प्रकार आप भी भक्तों पर कृपा करने के लिए निरंतर विकल रहने के कारण हम जैसे सकाम जीवों की भी कामना पूर्ण करके उनकी संसार-भय से रक्षा करते रहते हैं।'
(श्रीमद् भागवतः 4.9.6-17)
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