ब्रह्मा जी द्वारा स्तुति
सृष्टि से पूर्व यह सम्पूर्ण विश्व जल में डूबा हुआ था। उस समय एकमात्र श्रीनारायण देव शेषशय्या पर लेटे हुए थे। एक सहस्र चतुर्युगपर्यन्त जल में शयन करने के अनन्तर उन्हीं के द्वारा नियुक्त उनकी कालशक्ति ने उन्हें जीवों के कर्मों की प्रवृत्ति के लिए प्रेरित किया। जिस समय भगवान की दृष्टि अपने में निहित लिंग शरीरादि सूक्ष्म तत्त्व पर पड़ी, तब वह सूक्ष्म तत्त्व कालाश्रित रजोगुण से क्षुभित होकर सृष्टि-रचना के निमित्त कमलकोश के रूप में सहसा ऊपर उठा। कमल पर ब्रह्मा जी विराजमान थे। वे सोचने लगेः 'इस कमल की कर्णिका पर बैठा हुआ मैं कौन हूँ? यह कमल भी बिना किसी अन्य आधार के जल में कहाँ से उत्पन्न हो गया? इसके नीचे अवश्य कोई वस्तु होनी चाहिए, जिसके आधार पर यह स्थित है।' अपने उत्पत्ति-स्थान को खोजते-खोजते ब्रह्माजी को बहुत काल बीत गया। अन्त में प्राणवायु को धीरे-धीरे जीतकर चित्त को निःसंकल्प किया और समाधि में स्थित हो गये। तब उन्होंने अपने उस अधिष्ठान को, जिसे वे पहले खोजने पर भी नहीं देख पाये थे, अपने ही अंतःकरण में प्रकाशित होते देखा तथा श्रीहरि में चित्त लगाकर उन परम पूजनीय प्रभु की स्तुति करने लगेः
'आप सर्वदा अपने स्वरूप के प्रकाश से ही प्राणियों के भेद भ्रमरूप अंधकार का नाश करते रहते हैं तथा ज्ञान के अधिष्ठान साक्षात् परम पुरुष हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। संसार की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के निमित्त से जो माया की लीला होती है, वह आपका ही खेल है, अतः आप परमेश्वर को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।
यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति।
ते नैकजन्मशमलं सहसैव हित्वा संयान्त्यपावृतमृतं तमजं प्रपद्ये।।
जो लोग प्राणत्याग करते समय आपके अवतार, गुण और कर्मों को सूचित करने वाले देवकीनन्दन, जनार्दन, कंसनिकंदन आदि नामों का विवश होकर भी उच्चारण करते हैं, वे अनेकों जन्मों के पापों से तत्काल छूटकर मायादि आवरणों से रहित ब्रह्मपद प्राप्त करते हैं। आप नित्य अजन्मा हैं, मैं आपकी शरण लेता हूँ। अनुक्रम
(श्रीमद् भागवतः 3.9.15)
भगवन् ! इस विश्ववृक्ष के रूप में आप ही विराजमान हैं। आप ही अपनी मूल प्रकृति को स्वीकार करके जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के लिए मेरे, अपने और महादेवजी के रूप में तीन प्रधान शाखाओं में विभक्त हुए हैं और फिर प्रजापति एवं मनु आदि शाखा-प्रशाखाओं के रूप में फैलकर बहुत विस्तृत हो गये हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। भगवन् ! आपने अपनी आराधना को ही लोकों के लिए कल्याणकारी स्वधर्म बताया है, किंतु वे इस ओर से उदासीन रहकर सर्वदा विपरीत (निषिद्ध) कर्मों में लगे रहते हैं। ऐसी प्रमाद की अवस्था में पड़े हुए इन जीवों की जीवन-आशा को जो सदा सावधान रहकर बड़ी शीघ्रता से काटता रहता है, वह बलवान काल भी आपका ही रूप है; मैं उसे नमस्कार करता हूँ। यद्यपि मैं सत्यलोक का अधिष्ठाता हूँ, जो परार्द्धपर्यन्त रहने वाला और समस्त लोकों का वन्दनीय है तो भी आपके उस कालरूप से डरता रहता हूँ। उससे बचने और आपको प्राप्त करने के लिए ही मैंने बहुत समय तक तपस्या की है। आप ही अधियज्ञरूप से मेरी इस तपस्या के साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप पूर्णकाम हैं, आपको किसी विषयसुख की इच्छा नहीं है तो भी आपने अपनी बनायी हुई धर्ममर्यादा की रक्षा के लिए पशु-पक्षी, मनुष्य और देवता आदि जीवयोनियों में अपनी ही इच्छा से शरीर धारण कर अनेकों लीलाएँ की हैं। ऐसे आप पुरुषोत्तम भगवान को मेरा नमस्कार है।
प्रभो ! आप अविद्या, अस्मिता, राग द्वेष और अभिनिवेश – पाँचों में से किसी के भी अधीन नहीं हैं; तथापि इस समय जो सारे संसार को अपने उदर में लीन कर भयंकर तरंगमालाओं से विक्षुब्ध प्रलयकालीन जल में अनन्तविग्रह की कोमल शय्या पर शयन कर रहे हैं, वह पूर्वकाल की कर्म परम्परा से श्रमित हुए जीवों को विश्राम देने के लिए ही है। आपके नाभिकमलरूप भवन से मेरा जन्म हुआ है। यह सम्पूर्ण विश्व आपके उदर में समाया हुआ है। आपकी कृपा से ही मैं त्रिलोकी की रचना रूप उपकार में प्रवृत्त हुआ हूँ। इस समय योगनिद्रा का अंत हो जाने के कारण आपके नेत्रकमल विकसित हो रहे हैं आपको मेरा नमस्कार है। आप सम्पूर्ण सुहृद और आत्मा हैं तथा शरणागतों पर कृपा करने वाले हैं। अतः अपने जिस ज्ञान और ऐश्वर्य से आप विश्व को आनन्दित करते हैं, उसी से मेरी बुद्धि को भी युक्त करें – जिससे मैं पूर्वकल्प के समान इस समय भी जगत की रचना कर सकूँ। आप भक्तवांछाकल्पतरु हैं। अपनी शक्ति लक्ष्मीजी के सहित अनेक गुणावतार लेकर आप जो-जो अदभुत कर्म करेंगे, मेरा यह जगत की रचना करने का उद्यम भी उन्हीं में से एक है। अतः इसे रचते समय आप मेरे चित्त को प्रेरित करें, शक्ति प्रदान करें, जिससे मैं सृष्टि रचनाविषयक अभिमानरूप मल से दूर रह सकूँ। प्रभो ! इस प्रलयकालीन जल में शयन करते हुए आप अनन्तशक्ति परमपुरुष के नाभि-कमल से मेरा प्रादुर्भाव हुआ है और मैं हूँ भी आपकी ही विज्ञानशक्ति अतः इस जगत के विचित्र रूप का विस्तार करते समय आपकी कृपा से मेरी वेदरूप वाणी का उच्चारण लुप्त न हो। आप अपार करुणामय पुराणपुरुष हैं। आप परम प्रेममयी मुस्कान के सहित अपने नेत्रकमल खोलिये और शेषशय्या से उठकर विश्व के उदभव के लिए अपनी सुमधुर वाणी से मेरा विषाद दूर कीजिए।'
(श्रीमद् भागवतः 3.9.14-25)
भगवान की महिमा असाधारण है। वे स्वयंप्रकाश, आनंदस्वरूप और माया से अतीत है। उन्हीं की माया में तो सभी मुग्ध हो रहे हैं परंतु कोई भी माया-मोह भगवान का स्पर्श नहीं कर सकता। ब्रह्मजी उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण को ग्वाल-बाल और बछड़ों का अपहरण कर, अपनी माया से मोहित करने चले थे। किन्तु उनको मोहित करना तो दूर रहा, वे अजन्मा होने पर भी अपनी ही माया से अपने-आप मोहित हो गये। ब्रह्माजी समस्त विद्याओं के अधिपति हैं तथापि भगवान के दिव्य स्वरूप को वे तनिक भी न समझ सके कि यह क्या है। यहाँ तक कि वे भगवान के महिमामय रूपों को देखने में भी असमर्थ हो गये। उनकी आँखें मुँद गयीं। भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्माजी का मोह और असमर्थता को जान कर अपनी माया का पर्दा हटा दिया। इससे ब्रह्माजी को ब्रह्मज्ञान हुआ। फिर ब्रह्माजी ने अपने चारों मुकुटों के अग्रभाग से भगवान के चरणकमलों का स्पर्श करके नमस्कार किया और आनंद के आँसुओं की धारा से उन्हें नहला दिया। बहुत देर तक वे भगवान के चरणों में ही पड़े रहे। फिर धीरे-धीरे उठे और अपने नेत्रों के आँसू पोंछे। प्रेम और मुक्ति के एकमात्र उदगम भगवान को देखकर उनका सिर झुक गया। अंजलि बाँधकर बड़ी नम्रता और एकाग्रता के साथ गदगद वाणी से वे भगवान की स्तुति करने लगेः
'प्रभो ! एकमात्र आप ही स्तुति करने योग्य हैं। मैं आपके चरणों में नमस्कार करता हूँ। आपका यह शरीर वर्षाकालीन मेघ के समान श्यामल है, इस पर पीताम्बर स्थिर बिजली के समान झिलमिल-झिलमिल करता हुआ शोभा पाता है, आपके गले में घुँघची की माला, कानों में मकराकृति कुण्डल तथा सिर पर मोरपंखों का मुकुट है, इन सबकी कांति से आपके मुख पर अनोखी छटा छिटक रही है। वक्षः स्थल पर लटकती हुई वनमाला और नन्हीं-सी हथेली पर दही-भात का कौर, बगल में बेंत और सिंगी तथा कमर की फेंट में आपकी पहचान बतानेवाली बाँसुरी शोभा पर रही है। आपके कमल-से सुकोमल परम सुकुमार चरण और यह गोपाल बालक का सुमधुर वेष। (मैं और कुछ नहीं जानता बस, मैं तो इन्हीं चरणों पर न्योछावर हूँ।) स्वयंप्रकाश परमात्मन् ! आपका यह श्रीविग्रह भक्तजनों की लालसा-अभिलाषा पूर्ण करने वाला है। यह आपकी चिन्मय इच्छा का मूर्तिमान स्वरूप मुझ पर आपका साक्षात कृपा प्रसाद है। मुझे अनुगृहीत करने के लिए ही आपने इसे प्रकट किया है। कौन कहता है कि यह पंचभूतों की रचना है?
प्रभो ! यह तो अप्राकृत शुद्ध सत्त्वमय है। मैं या और कोई समाधि लगाकर भी आपके इस सच्चिदानंद-विग्रह की महिमा नहीं जान सकता। फिर आत्मानन्दानुभवस्वरूप साक्षात् आपकी ही महिमा को तो कोई एकाग्र मन से भी कैसे जान सकता है।
ज्ञाने प्रयासमुदापास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम्।
स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवांगनोभिर्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम्।।
प्रभो ! जो लोग ज्ञान के लिए प्रयत्न न करके अपने स्थान में ही स्थित रहकर केवल सत्संग करते हैं; यहाँ तक कि उसे ही अपना जीवन बना लेते हैं, उसके बिना जी नहीं सकते। प्रभो ! यद्यपि आप पर त्रिलोकी में कोई कभी विजय नहीं प्राप्त कर सकता, फिर भी वे आप पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, आप उनके प्रेम के अधीन हो जाते हैं।
(श्रीमद् भागवतः10.15.3)
भगवन् ! आपकी भक्ति सब प्रकार के कल्याण का मूलस्रोत-उदगम है। जो लोग उसे छोड़कर केवल ज्ञान की प्राप्ति के लिए श्रम उठाते और दुःख भोगते हैं, उनको बस क्लेश-ही-क्लेश हाथ लगता है और कुछ नहीं। जैसे, थोथी भूसी कूटने वाले को केवल श्रम ही मिलता है, चावल नहीं।
हे अच्युत ! हे अनन्त ! इस लोक में पहले भी बहुत-से योगी हो गये हैं। जब उन्हें योगादि के द्वारा आपकी प्राप्ति न हुई, तब उन्होंने अपने लौकिक और वैदिक समस्त कर्म आपके चरणों में समर्पित कर दिये। उन समर्पित कर्मों से तथा आपकी लीला-कथा से उन्हें आपकी भक्ति प्राप्त हुई। उस भक्ति से ही आपके स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके उन्होंने बड़ी सुगमता से आपके परम पद की प्राप्ति कर ली। हे अनन्त ! आपके सगुण-निर्गुण दोनों स्वरूपों का ज्ञान कठिन होने पर भी निर्गुण स्वरूप की महिमा इन्द्रियों का प्रत्याहार करके शुद्ध अंतःकरण से जानी जा सकती है। (जानने की प्रक्रिया यह है कि) विशेष आकार के परित्यागपूर्वक आत्माकार अंतःकरण का साक्षात्कार किया जाय। यह आत्माकारता घट-पटादि रूप के समान ज्ञेय नहीं है, प्रत्युत आवरण का भंगमात्र है। यह साक्षात्कार 'यह ब्रह्म है', 'मैं ब्रह्म को जानता हूँ' इस प्रकार नहीं किंतु स्वयंप्रकाश रूप से ही होता है। परंतु भगवन् ! जिन समर्थ पुरुषों ने अनेक जन्मों तक परिश्रम करके पृथ्वी का एक-एक परमाणु, आकाश के हिमकण (ओस की बूँदें) तथा उसमें चमकने वाले नक्षत्र एवं तारों तक गिन डाला है, उनमें भी भला, ऐसा कौन हो सकता है जो आपके सगुण स्वरूप के अनन्त गुणों को गिन सके? प्रभो ! आप केवल संसार के कल्याण के लिए ही अवतीर्ण हुए हैं। सो भगवन् ! आपकी महिमा का ज्ञान तो बड़ा ही कठिन है। इसलिए जो पुरुष क्षण-क्षण पर बड़ी उत्सुकता से आपकी कृपा का ही भलीभाँति अनुभव करता रहता है और प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ सोख या दुःख प्राप्त होता है, उसे निर्विकार मन से भोग लेता है एवं जो प्रेमपूर्ण हृदय, गदगद वाणी और पुलकित शरीर से अपने को आपके चरणों में समर्पित करता रहता है – इस प्रकार जीवन व्यतीत करने वाला पुरुष ठीक वैसे ही आपके परम पद का अधिकारी हो जाता है, जैसे अपने पिता की सम्पत्ति का पुत्र !
प्रभो ! मेरी कुटिलता तो देखिये। आप अनन्त आदिपुरुष परमात्मा हैं और मेरे जैसे बड़े-बड़े मायावी भी आपकी माया के चक्र में हैं। फिर भी मैंने आप पर अपनी माया फैलाकर अपना ऐश्वर्य देखना चाहा। प्रभो ! मैं आपके सामने हूँ ही क्या। क्या आग के सामने चिनगारी की भी कुछ गिनती है? भगवन् ! मैं रजोगुण से उत्पन्न हुआ हूँ, आपके स्वरूप को मैं ठीक-ठाक नहीं जानता। इसी से अपने को आपसे अलग संसार का स्वामी माने बैठा था। मैं अजन्मा जगत्कर्ता हूँ – इस मायाकृत मोह के घने अंधकार से मैं अंधा हो रहा था। इसलिए आप यह समझकर कि 'यह मेरे ही अधीन है, मेरा भृत्य है, इस पर कृपा करनी चाहिए', मेरा अपराध क्षमा कीजिए। मेरे स्वामी ! प्रकृति, महत्तत्व, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीरूप आवरणों से घिरा हुआ यह ब्रह्माण्ड ही मेरा शरीर है और आपके एक-एक रोम के छिद्र में ऐसे-ऐसे अगणित ब्रह्माण्ड उसी प्रकार उड़ते-पड़ते रहते हैं, जैसे झरोखे की जाली में से आनेवाली सूर्य की किरणों में रज के छोटे-छोटे परमाणु उड़ते हुए दिखायी पड़ते हैं। कहाँ अपने परिमाण से साढ़े तीन हाथ के शरीरवाला अत्यंत क्षुद्र मैं और कहाँ आपकी अनन्त महिमा। वृत्तियों की पकड़ में न आनेवाले परमात्मन् ! जब बच्चा माता के पेट में रहता है, तब अज्ञानवश अपने हाथ पैर पीटता है; परंतु क्या माता उसे अपराध समझती है या उसके लिए वह कोई अपराध होता है? 'है' और 'नहीं है' – इन शब्दों से कही जाने वाली कोई भी वस्तु ऐसी है क्या, जो आपकी कोख के भीतर न हो?
श्रुतियाँ कहती हैं कि जिस समय तीनों लोक प्रलयकालीन जल में लीन थे, उस समय उस जल में स्थित श्रीनारायण के नाभिकमल से ब्रह्म का जन्म हुआ। उनका यह कहना किसी प्रकार असत्य नहीं हो सकता। तब आप ही बतलाइये, प्रभो ! क्या मैं आपका पुत्र नहीं हूँ?
नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिनामात्मास्यधीशाखिललोकसाक्षी।
नारायणोङ्गं नरभूजलायात्तच्चापि सत्यं न तदैव माया।।
प्रभो ! आप समस्त जीवों के आत्मा हैं। इसलिए आप नारायण (नार-जीव और अयन-आश्रय) हैं। आप समस्त जगत के और जीवों अधीश्वर है, इसलिए आप नारायण (नार-जीव और अयन-प्रवर्तक) हैं। आप समस्त लोकों के साक्षी हैं, इसलिए भी नारायण (नार-जीव और अयन-जानने वाला) है। नर से उत्पन्न होने वाले जल में निवास करने के कारण जिन्हें नारायण (नार-जल और अयन-निवासस्थान) कहा जाता है, वे भी आपके एक अंश ही हैं। वह अंशरूप से दिखना भी सत्य नहीं है, आपकी माया ही है।
(श्रीमद् भागवतः 10.14.14)
भगवन् ! यदि आपका वह विराट स्वरूप सचमुच उस समय कमलनाल के मार्ग से उसे सौ वर्ष तक जल में ढूँढता रहा? फिर मैंने जब तपस्या की, तब उसी समय मेरे हृदय में उसका दर्शन कैसे हो गया? और फिर कुछ ही क्षणों में वह पुनः क्यों नहीं दिखा, अंतर्धान क्यों हो गया? माया का नाश करने वाले प्रभो ! दूर की बात कौन करे, अभी इसी अवतार में आपने इस बाहर दिखने वाले जगत को अपने पेट में ही दिखला दिया, जिसे देखकर माता यशोदा चकित हो गयी थी। इससे यही तो सिद्ध होता है कि यह सम्पूर्ण विश्व केवल आपकी माया-ही-माया है। जब आपके सहित यह सम्पूर्ण विश्व जैसा बाहर दिखता है वैसा ही आपके उदर में भी दिखा, तब क्या यह सब आपकी माया के बिना ही आपमें प्रतीत हुआ? अवश्य ही आपकी लीला है। उस दिन की बात जाने दीजिए, आज की ही लीजिए। क्या आज आपने मेरे सामने अपने अतिरिक्त सम्पूर्ण विश्व को अपनी माय का खेल नहीं दिखलाया है? पहले आप अकेले थे। फिर सम्पूर्ण ग्वाल-बाल, बछड़े और छड़ी-छीके भी आप ही हो गये। उसके बाद मैंने देखा कि आपके वे सब रूप चतुर्भुज हैं और मेरे सहित सब-के-सब तत्त्व उनकी सेवा कर रहे हैं। आपने अलग-अलग उतने ही ब्रह्माण्डों का रूप भी धारण कर लिया था, परंतु अब आप केवल अपरिमित अद्वितिय ब्रह्मरूप से ही शेष रह गये हैं।
जो लोग अज्ञानवश आपके स्वरूप को नहीं जानते, उन्हीं को आप प्रकृति में स्थित जीव के रूप से प्रतीत होते हैं और उन पर अपनी माया का पर्दा डालकर सृष्टि के समय मेरे (ब्रह्मा) रूप से पालन के समय अपने (विष्णु) रूप से और संहार के समय रूद्र के रूप में प्रतीत होते हैं।
प्रभो ! आप सारे जगत के स्वामी और विधाता है। अजन्मा होने पर भी आपके देवता, ऋषि, पशु-पक्षी और जलचर आदि योनियों में अवतार ग्रहण करते हैं। इसलिए की इन रूपों के द्वारा दुष्ट पुरुषों का घमण्ड तोड़ दें और सत्पुरुषों पर अनुग्रह करें। भगवन् ! आप अनन्त परमात्मा और योगेश्वर हैं? जिस समय आप अपनी माया का विस्तार करके लीला करने लगते हैं, उस समय त्रिलोकी में ऐसा कौन है, जो यह जान सके की आपकी लीला कहाँ, किसलिए, कब और कितनी होती। इसलिए यह सम्पूर्ण जगत स्वप्न के समान असत्य, अज्ञानरूप और दुःख-पर दुःख देनेवाला है। आप परमानंद, परम अज्ञानस्वरूप एवं अनन्त हैं। यह माया से उत्पन्न एवं विलीन होने पर भी आपमें आपकी सत्ता से सत्य के समान प्रतीत होता है। प्रभो ! आप ही एकमात्र सत्य हैं क्योंकि आप सबके आत्मा जो हैं। आप पुराणपुरुष होने के कारण समस्त जन्मादि विकारों से रहित हैं। आप स्वयं प्रकाश हैं; इसलिए देश, काल और वस्तु जो परप्रकाश हैं किसी प्रकार आपको सीमित नहीं कर सकते। आप उनके भी आदि प्रकाशक हैं। आप अविनाशी होने के कारण नित्य हैं। आपका आनंद अखण्डित है। आपमें न तो किसी प्रकार का मल है और न अभाव। आप पूर्ण एक हैं। समस्त उपाधियों से मुक्त होने के कारण आप अमृतस्वरूप हैं। आपका यह ऐसा स्वरूप समस्त जीवों का ही अपना स्वरूप है। जो गुरुरूप सूर्य से तत्त्वज्ञानरूप दिव्य दृष्टि प्राप्त कर के उससे आपको अपने स्वरूप के रूप में साक्षात्कार कर लेते हैं, वे इस झूठे संसार-सागर को मानों पार कर जाते हैं। (संसार-सागर के झूठा होने के कारण इससे पार जाना भी अविचार-दशा की दृष्टि से ही है।) जो पुरुष परमात्मा को आत्मा के रूप में नहीं जानते, उन्हें उस अज्ञान के कारण ही इस नामरूपात्मक अखिल प्रपंच की उत्पत्ति का भ्रम हो जाता है। किंतु ज्ञान होते ही इसका आत्यंतिक प्रलय हो जाता है। जैसे रस्सी में भ्रम के कारण ही साँप की प्रतीति होती है और भ्रम के निवृत्त होते ही उसकी निवृत्ति हो जाती है। संसार सम्बन्धी बंधन और उससे मोक्ष – ये दोनों ही नाम अज्ञान से कल्पित हैं। वास्तव में ये अज्ञान के ही दो नाम हैं। ये सत्य और ज्ञानस्वरूप परमात्मा से भिन्न अस्तित्व नहीं रखते। जैसे सूर्य में दिन और रात का भेद नहीं है, वैसे ही विचार करने पर अखण्ड चित्स्वरूप केवल शुद्ध आत्मतत्त्व में न बंधन है और न तो मोक्ष। भगवन् कितने आश्चर्य की बात है कि आप हैं अपने आत्मा, पर लोग आपको पराया मानते हैं और शरीर आदि हैं पराये, किंतु उनको आत्मा मान बैठते हैं और इसके बाद आपको कहीं अलग ढूँढने लगते हैं। भला, अज्ञानी जीवों का यह कितना बड़ा अज्ञान है। हे अनन्त ! आप तो सबके अंतःकरण में ही विराजमान हैं। इसलिए संत लोग आपके अतिरिक्त जो कुछ प्रतीत हो रहा है, उसका परित्याग करते हुए अपने भीतर आपको ढूँढते हैं। क्योंकि यद्यपि रस्सी में साँप नहीं है, फिर भी उस प्रतीयमान साँप को मिथ्या निश्चय किये बिना भला, कोई सत्पुरुष सच्ची रस्सी को कैसे जान सकता है?
अपने भक्तजनों के हृदय में स्वयं स्फुरित होने वाले भगवन् ! आपके ज्ञान का स्वरूप और महिमा ऐसी ही है, उससे अज्ञानकल्पित जगत का नाश हो जाता है। फिर भी जो पुरुष आपके युगल चरणकमलों का तनिक सा भी कृपा प्रसाद प्राप्त कर लेता है, उससे अनुगृहीत हो जाता है, वही आपकी सच्चिदानंदमयी महिमा का तत्त्व जान सकता है। दूसरा कोई भी ज्ञान वैराग्यादि साधनरूप अपने प्रयत्न से बहुत काल तक कितना भी अनुसंधान करता रहे, वह आपकी महिमा का यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता। इसलिए भगवन् ! मुझे इस जन्म में, दूसरे जन्म में अथवा किसी पशु-पक्षी आदि के जन्म में भी ऐसा सौभाग्य प्राप्त हो कि मैं आपके दासों में से कोई एक दास हो जाऊँ और फिर आपके चरणकमलों की सेवा करूँ। मेरे स्वामी ! जगत के बड़े-बड़े यज्ञ सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अब तक आपको पूर्णतः तृप्त न कर सके। परंतु आपने व्रज की गायों और ग्वालिनों के बछड़े एवं बालक बनकर उनके स्तनों का अमृत-सा दूध बड़े उमंग से पिया है। वास्तव में उन्हीं का जीवन सफल है, वे ही अत्यंत धन्य हैं। अहो ! नंद आदि व्रजवासी गोपों के धन्य भाग्य हैं वास्तव में उनका अहोभाग्य है, क्योंकि परमानन्दस्वरूप सनातन परिपूर्ण ब्रह्म आप उनके अपने सगे सम्बन्धी और सृहृद हैं। हे अच्युत ! इन व्रजवासियों के सौभाग्य की महिमा तो अलग रही, मन आदि ग्यारह इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवता के रूप में रहने वाले महादेव आदि हम लोग बड़े ही भाग्यवान हैं। क्योंकि व्रजवासियों की मन आदि ग्यारह इन्द्रियों को प्याले बनाकर हम आपके चरणकमलों का अमृत से भी मीठा, मदिरा से भी मादक मधुर मकरंद का पान करते रहते हैं। जब उसका एक-एक इन्द्रिय से पान करके हम धन्य-धन्य हो रहे हैं, तब समस्त इन्द्रियों से उसका सेवन करने वाले व्रजवासियों की तो बात ही क्या है। प्रभो ! इस व्रजभूमि के किसी वन में और विशेष करके गोकुल में किसी भी योनि में जन्म हो जाने पर आपके किसी-न-किसी प्रेमी के चरणों की धूलि अपने ऊपर पड़ ही जायेगी। प्रभो ! आपके प्रेमी व्रजवासियों का सम्पूर्ण जीवन आपका ही जीवन है। आप ही उनके जीवन के एकमात्र सर्वस्व हैं। इसलिए उनके चरणों की धूलि मिलना आपके ही चरणों की धूलि मिलना है और आपके चरणों की धूलि को तो श्रुतियाँ भी अनादि काल से अब तक ढूँढ ही रही हैं। देवताओं के भी आराध्यदेव प्रभो ! इन व्रजवासियों को इनकी सेवा के बदले में आप क्या फल देंगे? सम्पूर्ण फलों के फलस्वरूप ! आपसे बढ़कर और कोई फल तो है ही नहीं, यह सोचकर मेरा चित्त मोहित हो रहा है। आप उन्हें अपना स्वरूप भी देकर उऋण नहीं हो सकते। क्योंकि आपके स्वरूप को तो उस पूतना ने भी अपने सम्बन्धियों अघासुर, बकासुर आदि के साथ प्राप्त कर लिया, जिसका केवल वेष ही साध्वी स्त्री का था, पर जो हृदय से महान क्रूर थी। फिर जिन्होंने अपने घर, धन, स्वजन, प्रिय, शरीर, पुत्र, प्राण और मन, सब कुछ आपके ही चरणों में समर्पित कर दिया है, जिनका सब कुछ आपके ही लिए है, उन व्रजवासियों को भी वही फल देकर आप कैसे उऋण हो सकते हैं। सच्चिदानंदस्वरूप श्यामसुन्दर ! तभी तक राग-द्वेष आदि दोष चोरों के समान सर्वस्व अपहरण करते रहते हैं, तभी तक घर और उसके सम्बन्धी कैद की तरह सम्बन्ध के बन्धनों में बाँध रखते हैं और तभी तक मोह पैर की बेड़ियों की तरह जकड़े रखता है, जब तक जीव आपका नहीं हो जाता। प्रभो ! आप विश्व के बखेड़े से सर्वथा रहित है, फिर भी अपने शरणागत भक्तजनों को अनन्त आनंद वितरण करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लेकर विश्व के समान ही लीला-विलास का विस्तार करते हैं।
मेरे स्वामी ! बहुत कहने की आवश्यकता नहीं। जो लोग आपकी महिमा जानते हैं, वे जानते रहें; मेरे मन, वाणी और शरीर तो आपकी महिमा जानने में सर्वथा असमर्थ हैं। सच्चिदानंद – स्वरूप श्रीकृष्ण ! आप सबके साक्षी हैं। इसलिए आप सब कुछ जानते हैं। आप समस्त जगत के स्वामी है। यह सम्पूर्ण प्रपंच आप में ही स्थित है। आपसे मैं और क्या कहूँ? अब आप मुझे स्वीकार कीजिये। मुझे अपने लोक में जाने की आज्ञा दीजिए। सबके मन-प्राण को अपनी रूप-माधुरी से आकर्षित करने वाले श्यामसुन्दर ! आप यदुवंशरूपी कमल को विकसित करने वाले सूर्य हैं। प्रभो ! पृथ्वी, देवता, ब्राह्मण और पशुरूप समुद्र की अभिवृद्धि करने वाले चंद्रमा भी आप ही हैं। आप पाखण्डियों के धर्मरूप रात्रि का घोर अंधकार नष्ट करने के लिए सूर्य और चंद्रमा दोनों के ही समान हैं। पृथ्वी पर रहने वाले राक्षसों के नष्ट करने वाले आप चंद्रमा, सूर्य आदि आदि समस्त देवताओं के भी परम पूजनीय हैं। भगवन् ! मैं अपने जीवनभर, महाकल्पपर्यन्त आपको नमस्कार ही करता रहूँ।'
(श्रीमद् भागवतः 10.14.1-40)
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