देवताओं द्वारा स्तुति

ब्रह्मादिक देवताओं द्वारा विष्णु भगवान से असुरों का विनाश तथा संतों की रक्षा हेतु प्रार्थना किये जाने पर सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण वसुदेव-देवकी के घर पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए थे। एक दिन सनकादिकों, देवताओं और प्रजापतियों के साथ ब्रह्माजी, भूतगणों के साथ सर्वेश्वर महादेवजी, मरुदगणों के साथ देवराज इन्द्र, आदित्यगण, आठों वसु, अश्विनी कुमार, ऋभु, अंगिरा के वंशज ऋषि, ग्यारह रूद्र, विश्वेदेव, साध्यगण, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक, ऋषि, पितर, विद्याधर और किन्नर आदि देवता मनुष्य सा मनोहर वेष धारण करने वाले और अपने श्यामसुन्दर विग्रह से सभी लोगों का मन अपनी ओर खींचकर रमा लेने वाले भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करने द्वारिकापुरी में आते हैं तब वे प्रभु श्रीकृष्ण की इस प्रकार से स्तुति करते हैं-
'स्वामी ! कर्मों के विकट फंदों से छूटने की इच्छावाले मुमुक्षुजन भक्तिभाव से अपने हृदय में जिन चरणकमलों का चिंतन करते रहते हैं। आपके उन्हीं चरणकमलों को हम लोगों ने अपनी बुद्धि, इन्द्रिय, प्राण, मन और वाणी से साक्षात् नमस्कार किया है। अहो ! आश्चर्य है ! अजित ! आप मायिक रज आदि गुणों में स्थित होकर इस अचिन्त्य नाम-रूपात्मक प्रपंच की त्रिगुणमयी माया के द्वारा अपने-आप में ही रचना करते हैं, पालन करते और संहार करते हैं। यह सब करते हुए भी इन कर्मों से से आप लिप्त नहीं होते हैं; क्योंकि आप राग द्वेषादि दोषों से सर्वथा मुक्त हैं और अपने निरावरण अखण्ड स्वरूपभूत परमानन्द में मग्न रहते हैं। स्तुति करने योग्य परमात्मन् ! जिन मनुष्यों की चित्तवृत्ति राग-द्वेषादि से कलुषित है, वे उपासना, वेदाध्यान, दान, तपस्या और यज्ञ आदि कर्म भले ही करें, परंतु उनकी वैसी शुद्धि नहीं हो सकती, जैसी श्रवण के द्वारा संपुष्ट शुद्धान्तःकरण सज्जन पुरुषों की आपकी लीलाकथा, कीर्ति के विषय में दिनोंदिन बढ़कर परिपूर्ण होने वाली श्रद्धा से होती है। मननशील मुमुक्षुजन मोक्षप्राप्ति के लिए अपने प्रेम से पिघले हुए हृदय क द्वारा जिन्हें लिये-लिये फिरते हैं, पांचरात्र विधि से उपासना करने वाले भक्तजन समान ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध – इस चतुर्व्यूह के रूप में जिनका पूजन करते हैं और जितेन्द्रिय और धीर पुरुष स्वर्गलोक का अतिक्रमण करके भगवद्धाम की प्राप्ति के लिए तीनों वेदों के द्वारा बतलायी हुई विधि से अपने संयत हाथों में हविष्य लेकर यज्ञकुण्ड में आहुति देते और उन्हीं का चिंतन करते हैं। आपकी आत्मस्वरूपिणी माया के जिज्ञासु योगीजन हृदय के अन्तर्देश में दहरविद्या आदि के द्वारा आपके चरणकमलों का ही ध्यान करते हैं और आपके बड़े-बड़े प्रेमी भक्तजन उन्हीं को अपनी परम इष्ट आराध्यदेव मानते हैं। प्रभो ! आपके वे ही चरणकमल हमारी समस्त अशुभ वासनाओं, विषय-वासनाओं को भस्म करने के लिए अग्निस्वरूप हों। वे हमारे पाप-तापों को अग्नि के समान भस्म कर दें। प्रभो ! यह भगवती लक्ष्मी आपके वक्षःस्थल पर मुरझायी हुई बासी वनमाला से भी सौत की तरह स्पर्धा रखती हैं। फिर भी आप उनकी परवाह न कर भक्तों के द्वारा इस बासी माला से की हुई पूजा भी प्रेम से स्वीकार करते हैं; ऐसे भक्तवत्सल प्रभु के चरणकमल सर्वदा हमारी विषय-वासनाओं को जलाने वाले अग्निस्वरूप हों। अनन्त ! वामनावतार में दैत्य राज बलि की दी हुई पृथ्वी को नापने के लिए जब आपने पग उठाया था और वह सत्यलोक में पहुँच गया था, तब यह ऐसा जान पड़ता था मानों, कोई बहुत बड़ा विजयध्वज हो। ब्रह्माजी द्वारा चरण पखारने के बाद उससे गिरती हुई गंगाजी के जल की तीन धाराएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानों, ध्वज में लगी हुई तीन पताकाएँ फहरा नहीं हों। उन्हें देखकर असुरों की सेना भयभीत हो गयी थी और देवसेना निर्भय। आपका यह चरणकमल साधुस्वभाव के पुरुषों के लिए आपके धाम वैकुण्ठलोक की प्राप्ति का और दुष्टों के लिए अधोगति का कारण है। भगवन् ! आपका वही पादपद्म हम भजन करने वालों के सारे पाप-ताप धो-बहा दे। ब्रह्मा आदि जितने भी शरीरधारी हैं, वे सत्व, रज, तम – इन तीनों अनुक्रम गुणों के परस्पर विरोधी त्रिविध भावों की टक्कर से जीते-मरते रहते हैं। वे सुख-दुःख के थपेड़ों से बाहर नहीं हैं और ठीक वैसे ही आपके वश में हैं, जैसे नथे हुए बैल अपने स्वामी के वश में होते हैं। आप उनके लिए भी कालस्वरूप हैं। उनके जीवन का आदि, मध्य और अंत आपके ही अधीन है। इतना ही नहीं, आप प्रकृति और पुरुष से भी परे स्वयं पुरुषोत्तम हैं। आपके चरणकमल हम लोगों का कल्याण करें।
प्रभो ! आप इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के परम कारण हैं; क्योंकि शास्त्रों ने ऐसा कहा है कि आप प्रकृति, पुरुष और महत्तत्व के भी नियंत्रण करने वाले काल हैं। शीत, ग्रीष्म और वर्षाकालरूप तीन नाभियों वाले संवत्सर के रूप में सबको क्षय की ओर ले जाने वाले काल आप ही हैं। आपकी गति अबाध और गम्भीर है। आप स्वयं पुरुषोत्तम हैं। यह पुरुष आपसे शक्ति प्राप्त करके अमोघवीर्य हो जाता है और फिर माया के साथ संयुक्त होकर विश्व के महत्तत्वरूप गर्भ का स्थापन करता है। इसके बाद वह महत्तत्व त्रिगुणमयी माया का अनुसरण करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार और मनरूप सात आवरणों (परतों) वाले इस सुवर्ण वर्ण ब्रह्माण्ड की रचना करता है। इसलिए हृषिकेश ! आप समस्त चराचर जगत के अधीश्वर हैं। यही कारण है कि माया की गुण-विषमता के कारण बनने वाले विभिन्न पदार्थों का उपभोग करते हुए भी आप उनमें लिप्त नहीं होते। यह केवल आपकी ही बात है। आपके अतिरिक्त दूसरे तो स्वयं उनका त्याग करके भी उन विषयों से डरते रहते हैं। सोलह हजार से अधिक रानियाँ आपके साथ रहती हैं। वे सब अपनी मंद-मंद मुस्कान और तिरछी चितवन  युक्त मनोहर भौंहों के इशारे से और सुर-ताल-आलापों से प्रौढ़ सम्मोहक कामबाण चलाती हैं और कामकला की विविध रीतियों से आपका मन आकर्षित करना चाहती हैं;परंतु फिर भी वे अपने परिपुष्ट कामबाणों से आपका मन तनिक भी न डिगा सकीं, वे असफल ही रहीं।
विभ्व्यस्तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम्।
आनुश्रवं श्रुतिभिरंघ्रिजमंगसंगैस्तीर्थद्वयं शुचिषदस्त उपस्पृशन्ति।।
आपने त्रिलोकी की पापराशि को धो बहाने के लिए दो प्रकार की पवित्र नदियाँ बहा रखी हैं – एक तो आपकी अमृतमयी लीला से भरी कथा-नदी और दूसरी आपके पाद-प्रक्षालन के जल से भरी गंगाजी। अतः सत्संगसेवी विवेकीजन कानों के द्वारा आपकी कथा-नदी में और शरीर के द्वारा गंगाजी में गोता लगाकर दोनों ही तीर्थों का सेवन करते हैं और अपने पाप मिटा देते हैं।'
(श्रीमद् भागवतः 11.6.7-11)

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