महाराज पृथु द्वारा स्तुति

जब राजा पृथु सौवां अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब इन्द्र ने ईर्ष्यावश उनके यज्ञ का घोड़ा हर लिया। इन्द्र की इस कुचाल का पता लगने पर महाराज पृथु इन्द्र का वध करने के लिए तैयार हो गये परंतु ऋत्विजों ने उन्हें रोक दिया और इन्द्र को अग्नि में हवन करने का वचन दिया।
याजक क्रोधपूर्वक इन्द्र का आवाहन कर स्त्रुवा द्वारा आहुति डालना ही चाहते थे कि ब्रह्माजी ने प्रकट होकर उन्हें रोक दिया और कहा कि महाराज पृथु के निन्यानवें ही यज्ञ रहने दो। पृथु के निन्यानवें यज्ञों से यज्ञभोक्ता यज्ञेश्वर भगवान विष्णुजी संतुष्ट हुए और प्रकट होकर राजा से इन्द्र को क्षमा करने के लिए कहा। इन्द्र अपने कर्म से लज्जित होकर राजा पृथु के चरणों में गिरना ही चाहते थे कि राजा ने उन्हें प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया।
फिर महाराज पृथु ने विश्वात्मा, भक्तवत्सल भगवान का पूजन किया और क्षण-क्षण में उमड़ते हुए भक्तिभाव में निमग्न होकर प्रभु के चरणकमल पकड़ लिए। श्री हरि वहाँ से जाना चाहते थे किंतु पृथु के प्रति जो उनका वात्सल्यभाव था उसने उन्हें रोक लिया। महाराज पृथु बी नेत्रों में जल भर आने के कारण न तो भगवान का  दर्शन ही कर सके और न कण्ठ गदगद हो जाने के कारण कुछ बोल ही सके। उन्हें हृदय से आलिंगन कर पकड़े रहे और हाथ जोड़े ज्यों-के-त्यों खड़े रह गये। फिर महाराज पृथु नेत्रों के आँसू पोंछकर अतृप्त दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए इस प्रकार स्तुति करने लगेः
'मोक्षपति प्रभो ! आप वर देने वाले ब्रह्मादि देवताओं को भी वर देने में समर्थ हैं। कोई भी बुद्धिमान पुरुष आपसे देहाभिमानियों के भोगने योग्य विषयों को कैसे माँग सकता है? वे तो नारकीय जीवों को भी मिलते हैं। अतः मैं इन तुच्छ विषयों को आपसे नहीं माँगता। 
न कामये नाथ तदप्यहं क्वचिन् न यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासवः।
महत्तमान्तर्हृदयान्मुखच्युतो विधत्स्व कर्णायुतमेष मे वरः।।
स उत्तमश्लोक महन्मुखच्युतो भवत्पदाम्भोजसुधाकणानिलः।
स्मृतिं पुनर्विस्मृततत्त्वर्त्मनां कुयोगिनां नो वितरत्यलं वरैः।।
मुझे तो उस मोक्षपद की भी इच्छा नहीं है जिसमें महापुरुषों के हृदय से उनके मुख द्वारा निकला हुआ आपके चरणकमलों का मकरन्द नहीं है, जहाँ आपकी कीर्ति-कथा सुनने का सुख नहीं मिलता। इसलिए मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिए, जिनसे मैं आपके लीलागुणों को सुनता ही रहूँ। पुण्यकीर्ति प्रभो ! आपके चरणकमल-मकरन्दरूपी अमृतकणों को लेकर महापुरुषों के मुख से जो वायु निकलती है, उसी में इतनी शक्ति होती है कि वह तत्त्व को भूले हुए हम कुयोगियों को पुनः तत्त्वज्ञान करा देती है। अतएव हमें दूसरे वरों की कोई आवश्यकता नहीं है।
(श्रीमद् भागवतः 4.20.24.25)
उत्तम कीर्ति वाले प्रभो ! सत्संग में आपके मंगलमय सुयश को दैववश एक बार भी सुन लेने पर कोई पशुबुद्धि पुरुष भले ही तृप्त हो जाये; गुणग्राही उसे कैसे छोड़ सकता है? सब प्रकार के पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए स्वयं लक्ष्मी जी भी आपके सुयश को सुनना चाहती हूँ। अब लक्ष्मीजी के समान मैं भी अत्यन्त उत्सुकता से आप सर्वगुणधाम पुरुषोत्तम की सेवा ही करना चाहता हूँ। किंतु ऐसा न हो कि एक ही पति की सेवा प्राप्त करने की होड़ होने के कारण आपके चरणों में ही मन को एकाग्र करने वाले हम दोनों में कलह छिड़ जाये।
जगदीश्वर ! जगज्जननी लक्ष्मी जी के हृदय में मेरे प्रति विरोधभाव होने की संभावना तो है ही; क्योंकि आपके जिस सेवाकार्य में उनका अनुराग है, उसी के लिए मैं भी लालायित हूँ। किंतु आप दीनों पर दया करते हैं, उनके तुच्छ कर्मों को भी बहुत करके मानते हैं। इसलिए मुझे आशा है कि हमारे झगड़े में भी आप मेरा ही पक्ष लेंगे। आप  तो अपने स्वरूप में ही रमण करते हैं, आपको भला लक्ष्मीजी से भी क्या लेना है। इसी से निष्काम महात्मा ज्ञान हो जाने के बाद भी आपका भजन करते हैं। आप  माया के कार्य अहंकारादि का सर्वथा अभाव है। भगवन् ! मुझे तो आपके चरणकमलों का निरंतर चिंतन करने से सिवा सत्पुरुषों का कोई और प्रयोजन ही नहीं जान पड़ता। मैं भी बिना किसी इच्छा के आपका भजन करता हूँ। आपने जो मुझसे कहा कि 'वर माँग' सो आपकी इस वाणी को तो मैं संसार की मोह में डालने वाली ही मानता हूँ। यही क्या, आपकी वेदरूपा वाणी ने भी तो जगत को बाँध रखा है। यदि उस वेदवाणीरूप रस्सी से लोग बँधे न होते तो वे मोहवश सकाम कर्म क्यों करते? प्रभो ! आपकी माया से ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप आपसे विमुख होकर अज्ञानवश अन्य स्त्री-पुत्रादि की इच्छा करता है। फिर भी जिस प्रकार पिता पुत्र की प्रार्थना की अपेक्षा न रखकर अपने-आप ही पुत्र का कल्याण करता है, उसी प्रकार आप भी हमारी इच्छा की अपेक्षा न करके हमारे हित के लिए स्वयं ही प्रयत्न करें।
(श्रीमद् भागवतः 4.20.23-31)

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