शुकदेवजी द्वारा स्तुति


उत्तरानन्दन राजा परीक्षित ने भगवत्स्वरूप मुनिवर शुकदेवजी से सृष्टिविषयक प्रश्न पूछा कि अनन्तशक्ति परमात्मा कैसे सृष्टि की उत्पत्ति, रक्षा एवं संहार करते हैं और वे किन-किन शक्तियों का आश्रय लेकर अपने-आपको ही खिलौने बनाकर खेलते हैं? इस प्रकार परीक्षित द्वारा भगवान की लीलाओं को जानने की जिज्ञासा प्रकट करने पर वेद और ब्रह्मतत्त्व के पूर्ण मर्मज्ञ शुकदेवजी लीलापुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की मंगलाचरण के रूप में इस प्रकार से स्तुति करते हैं-
'उन पुरुषोत्तम भगवान के चरणकमलों में मेरे कोटि-कोटि प्रणाम हैं, जो संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय की लीला करने के लिए सत्त्व, रज तथा तमोगुण रूप तीन शक्तियों को स्वीकार कर ब्रह्मा, विष्णु और शंकर का रूप धारण करते हैं। जो समस्त चर-अचर प्राणियों के हृदय में अंतर्यामीरूप से विराजमान हैं, जिनका स्वरूप और उसकी उपलब्धि का मार्ग बुद्धि के विषय नहीं हैं, जो स्वयं अनन्त हैं तथा जिनकी महिमा भी अनन्त है, हम पुनः बार-बार उनके चरणों में नमस्कार करते हैं। जो सत्पुरुषों का दुःख मिटाकर उन्हें अपने प्रेम का दान करते हैं, दुष्टों की सांसारिक बढ़ती रोककर उन्हें मुक्ति देते हैं तथा जो लोग परमहंस आश्रम में स्थित हैं, उन्हें उनकी भी अभीष्ट वस्तु का दान करते हैं। क्योंकि चर-अचर समस्त प्राणी उन्हीं की मूर्ति हैं, इसलिए किसी से भी उनका पक्षपात नहीं है। जो बड़े ही भक्तवत्सल हैं और हठपूर्वक भक्तिहीन साधन करने वाले लोग जिनकी छाया भी नहीं छू सकते; जिनके समान भी किसी का ऐश्वर्य नहीं है, फिर उससे अधिक तो हो ही कैसे सकता है तथा ऐसे ऐश्वर्य से युक्त होकर जो निरन्तर ब्रह्मस्वरूप अपने धाम में विहार करते रहते हैं, उन भगवान श्रीकृष्ण को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ। जिनका कीर्तन,  स्मरण, दर्शन, वंदल, श्रवण और पूजन जीवों के पापों को तत्काल नष्ट कर देता है, उन पुण्यकीर्ति भगवान श्रीकृष्ण को बार-बार नमस्कार है। 
विचक्षणा यच्चरणोपसादनात् संगं व्युदस्योभयतोऽन्तरात्मनः।
विन्दन्ति हि ब्रह्मगतिं गतक्लमास्तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः।।
तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमंगलाः।
क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः।।
विवेकी पुरुष जिनके चरणकमलों की शरण लेकर अपने हृदय से इस लोक और परलोक की आसक्ति निकाल डालते हैं और बिना किसी परिश्रम के ही ब्रह्मपद को प्राप्त कर लेते हैं, उन मंगलमय कीर्तिवाले भगवान श्रीकृष्ण को अनेक बार नमस्कार है। बड़े-बड़े तपस्वी, दानी, यशस्वी, मनस्वी, सदाचारी और मंत्रवेत्ता जब तक अपनी साधनाओं को तथा अपने-आपको उनके चरणों में समर्पित नहीं कर देते, तब तक उन्हें कल्याण की प्राप्ति नहीं होती। जिनके प्रति आत्मसमर्पण की ऐसी महिमा है, उन कल्याणमयी कीर्तिवाले भगवान को बार-बार नमस्कार है।
(श्रीमद् भागवतः 2.4.16.17)
किरात, हूण, आंध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि नीच जातियाँ तथा दूसरे पापी जिनके शरणागत भक्तों की शरण ग्रहण करने से ही पवित्र हो जाते हैं, उन सर्वशक्तिमान भगवान को बार-बार नमस्कार है।
वे ही भगवान ज्ञानियों के आत्मा हैं, भक्तों के स्वामी हैं, कर्मकाण्डियों के लिए वेदमूर्ति हैं। ब्रह्मा, शंकर आदि बड़े-बड़े देवता भी अपने शुद्ध हृदय से उनके स्वरूप का चिंतन करते और आश्चर्यचकित होकर देखते रहते हैं। वे मुझ पर अपने अनुग्रह की, प्रसाद की वर्षा करें।
जो समस्त सम्पत्तियों की स्वामिनी लक्ष्मीदेवी के पति हैं, समस्त यज्ञों के भोक्ता एवं फलदाता है, प्रजा के रक्षक हैं, सबके अंतर्यामी और समस्त लोकों के पालनकर्ता हैं तथा पृथ्वीदेवी के स्वामी हैं, जिन्होंने यदुवंश में प्रकट होकर अंधक, वृष्णि एवं यदुवंश के लोगों की रक्षा की है तथा जो उन लोगों के एकमात्र आश्रय रहे हैं – वे भक्तवत्सल, संतजनों के सर्वस्व श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों। विद्वान पुरुष जिनके चरणकमलों के चिंतनरूप समाधि से शुद्ध हुई बुद्धि के द्वारा आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करते हैं तथा उनके दर्शन के अनन्तर अपनी-अपनी मति और रूचि के अनुसार जिनके स्वरूप का वर्णन करते रहते हैं, वे प्रेम और मुक्ति को लुटाने वाले भगवान श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों। जिन्होंने सृष्टि के समय ब्रह्मा के हृदय में पूर्वकाल की स्मृति जाग्रत करने के लिए ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी को प्रेरित किया और वे अपने अंगों के सहित वेद के रूप में उनके मुख से प्रकट हुई, वे ज्ञान के मूल कारण भगवान मुझ पर कृपा करें, मेरे हृदय में प्रकट हों। भगवान ही पंचमहाभूतों से इन शरीरों का निर्माण करके इनमें जीवरूप से शयन करते हैं और पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच, प्राण और एक मन – इन सोलह कलाओं से युक्त होकर इनके द्वारा सोलह विषयों का भोग करते हैं। वे सर्वभूतमय भगवान मेरी वाणी को अपने गुणों से अलंकृत कर दें। संतपुरुष जिनके मुखकमल से मकरन्द के समान झरती हुई ज्ञानमयी सुधा का पान करते रहते हैं, उन वासुदेवावतार सर्वज्ञ भगवान व्यास के चरणों में मेरा बार-बार नमस्कार है।
(श्रीमद् भागवतः 2.4.12-24)

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