कुन्ती द्वारा स्तुति
अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को नष्ट करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। उत्तरा उस अस्त्र को अपनी ओर आता देख देवाधिदेव, जगदीश्वर प्रभु श्रीकृष्ण से प्रार्थना करने लगी कि 'हे प्रभो ! आप सर्वशक्तिमान हैं। आप ही निज शक्ति माया से संसार की सृष्टि, पालन एवं संहार करते हैं। स्वामिन् ! यह बाण मुझे भले ही जला डाले, परंतु मेरे गर्भ को नष्ट न करे – ऐसी कृपा कीजिये।' भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्त की करूण पुकार सुन पाण्डवों की वंश परम्परा चलाने के लिए उत्तरा के गर्भ को अपनी माया के कवच से ढक दिया।
यद्यपि ब्रह्मास्त्र अमोघ है और उसके निवारण का कोई उपाय भी नहीं है, फिर भी भगवान श्रीकृष्ण के तेज के सामने आकर वह शांत हो गया। इस प्रकार अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा गे गर्भ में परीक्षित की रक्षा कर जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका जाने लगेष तब पाण्डु पत्नी कुन्ती ने अपने पुत्रों तथा द्रौपदी के साथ भगवान श्री कृष्ण की बड़े मधुर शब्दों में इस प्रकार स्तुति कीः
'हे प्रभो ! आप सभी जीवों के बाहर और भीतर एकरस स्थित हैं, फिर भी इन्द्रियों और वृत्तियों से देखे नहीं जाते क्योंकि आप प्रकृति से परे आदिपुरुष परमेश्वर हैं। मैं आपको बारम्बार नमस्कार करती हूँ। इन्द्रियों से जो कुछ जाना जाता है, उसकी तह में आप ही विद्यमान रहते हैं और अपनी ही माया के पर्दे से अपने को ढके रहते हैं। मैं अबोध नारी आप अविनाशी पुरुषोत्तम को भला, कैसे जान सकती हूँ?
हे लीलाधर ! जैसे मूढ़ लोग दूसरा भेष धारण किये हुए नट को प्रत्यक्ष देखकर भी नहीं पहचान सकते, वैसे ही आप दिखते हुए भी नहीं दिखते। आप शुद्ध हृदय वाले, विचारशील जीवन्मुक्त परमहंसो के हृदय में अपनी प्रेममयी भक्ति का सृजन करने के लिए अवतीर्ण हुए हैं। फिर हम अल्पबुद्धि स्त्रियाँ आपको कैसे पहचान सकती हैं? आप श्रीकृष्ण, वासुदेव, देवकीनन्दन, नन्दगोप लाडले लाल गोविन्द को हमारा बारम्बार प्रणाम है।
जिनकी नाभि से ब्रह्मा का जन्मस्थान कमल प्रकट हुआ है, जो सुन्दर कमलों की माला धारण करते हैं, जिनके नेत्र कमल के समान विशाल और कोमल हैं, जिनके चरमकमलों में कमल का चिह्न है, ऐसे श्रीकृष्ण को मेरा बार-बार नमस्कार है। हृषिकेष ! जैसे आपने दुष्ट कंस के द्वारा कैद की हुई और चिरकाल से शोकग्रस्त देवकी रक्षा की थी, वैसे ही आपने मेरी भी पुत्रों के साथ बार-बार विपत्तियों से रक्षा की है। आप ही हमारे स्वामी हैं। आप सर्वशक्तिमान हैं। श्रीकृष्ण ! कहाँ तक गिनाऊँ? विष से, लाक्षागृह की भयानक आग से, हिडिम्ब आदि राक्षसों की दृष्टि से, दुष्टों की द्यूत-सभा से, वनवास की विपत्तियों से और अनेक बार के युद्धों में अनेक महारथियों के शस्त्रास्त्रों से और अभी-अभी इस अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से भी आपने ही हमारी रक्षा की है।
विपदः सन्तु न शश्वत्तत्र तत्र जगद् गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्।।
हे जगदगुरो ! हमारे जीवन में सर्वदा पग-पग पर विपत्तियाँ आती रहें, क्योंकि विपत्तियों में ही निश्चित रूप से आपके दर्शन हुआ करते हैं और आपके दर्शन हो जाने पर फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में नहीं आना पड़ता।
(श्रीमद् भागवतः 1.8.25)
ऊँचे कुल में जन्म, ऐश्वर्य, विद्या और सम्पत्ति के कारण जिसका घमंड बढ़ रहा है, वह मनुष्य तो आपका नाम भी नहीं ले सकता, क्योंकि आप तो उन लोगों को दर्शन देते हैं, जो अकिंचन हैं। आप निर्धनों के परम धन हैं। माया का प्रपंच आपका स्पर्श भी नहीं कर सकता। आप अपने-आप में ही विहार करने वाले एवं परम शांतस्वरूप हैं। आप ही कैवल्य मोक्ष के अधिपति है। मैं आपको अनादि, अनन्त, सर्वव्यापक, सबके नियन्ता, कालरूप, परमेश्वर समझती हूँ और बारम्बार नमस्कार करती हूँ। संसार के समस्त पदार्थ और प्राणी आपस टकरा कर विषमता के कारण परस्पर विरूद्ध हो रहे हैं, परंतु आप सबमें समान रूप से विचर रहे हैं। भगवन् ! आप जब मनुष्यों जैसी लीला करते हैं, तब आप क्या करना चाहते हैं यह कोई नहीं जानता। आपका कभी कोई न प्रिय है और न अप्रिय। आपके सम्बन्ध में लोगों की बुद्धि ही विषम हुआ करती है। आप विश्व के आत्मा हैं, विश्वरूप हैं। न आप जन्म लेते हैं और न कर्म करते हैं। फिर भी पशु-पक्षी, मनुष्य, ऋषि, जलचर आदि में आप जन्म लेते हैं और उन योनियों के अनुरूप आपने दूध की मटकी फोड़कर यशोदा मैया को खिजा दिया था और उन्होंने आपको बाँधने के लिए हाथ में रस्सी ली थी, तब आपकी आँखों में आँसू छलक आये थे, काजल कपोलों पर बह चला था, नेत्र चंचल हो रहे थे और भय की भावना से आपने अपने मुख को नीचे की ओर झुका लिया था ! आपकी उस दशा का, लीला-छवि का ध्यान करके मैं मोहित हो जाती हूँ। भला, जिससे भय भी भय मानता है, उसकी यह दशा !
आपने अजन्मा होकर भी जन्म क्यों लिया है, इसका कारण बतलाते हुए कोई-कोई महापुरुष यों कहते हैं कि जैसे मलयाचल की कीर्ति का विस्तार करने के लिए उसमें चंदन प्रकट होता, वैसे ही अपने प्रिय भक्त पुण्यश्लोक राजा यदु की कीर्ति का विस्तार करने के लिए ही आपने उनके वंश में अवतार ग्रहण किया है। दूसरे लोग यों कहते हैं कि वासुदेव और देवकी ने पूर्व जन्म में (सुतपा और पृश्नि के रूप में) आपसे यही वरदान प्राप्त किया था, इसीलिए आप अजन्मा होते हुए भी जगत के कल्याण और दैत्यों के नाश के लिए उनके पुत्र बने हैं। कुछ और लोग यों कहते हैं कि यह पृथ्वी दैत्यों के अत्यंत भार से समुद्र में डूबते हुए जहाज की तरह डगमगा रही थी, पीड़ित हो रही थी, तब ब्रह्मा की प्रार्थना से उसका भार उतारने के लिए ही आप प्रकट हुए। कोई महापुरुष यों कहते हैं कि जो लोग इस संसार में अज्ञान, कामना और कर्मों के बंधन में जकड़े हुए पीड़ित हो रहे हैं, उन लोगों के लिए श्रवण और स्मरण करने योग्य लीला करने के विचार से ही आपने अवतार ग्रहण किया है। भक्तजन बार-बार आपके चरित्र का श्रवण, गान, कीर्तन एवं स्मरण करके आनंदित होते रहते हैं, वे ही अविलम्ब आपके उन चरणकमलों के दर्शन कर पाते हैं, जो जन्म-मृत्यु के प्रवाह को सदा के लिए रोक देते हैं।
भक्तवांछा हम लोगों को छोड़कर जाना चाहते हैं? आप जानते हैं कि आपके चरमकमलों के अतिरिक्त हमें और किसी का सहारा नहीं है। पृथ्वी के राजाओं के तो हम यों ही विरोधी हो गये हैं। जैसे जीव के बिना इन्द्रियाँ शक्तिहीन हो जाती हैं, वैसे ही आपके दर्शन बिना यदुवंशियों के और हमारे पुत्र पाण्डवों के नाम तथा रूप का अस्तित्व ही क्या रह जाता है। गदाधर ! आपके विलक्षण चरणचिह्नों से चिह्नित यह कुरुजांगल देश की भूमि आज जैसी शोभायमान हो रही है, वैसी आपके चले जाने के बाद न रहेगी। आपकी दृष्टि के प्रभाव से ही यह देश पकी हुई फसल तथा लता-वृक्षों से समृद्ध हो रहा है। ये वन, पर्वत, नदी और समुद्र भी आपकी दृष्टि से ही वृद्धि को प्राप्त हो रहे हैं। आप विश्व के स्वामी हैं, विश्व के आत्मा हैं और विश्वरूप हैं। यदुवंशियों और पाण्डवों में मेरी बड़ी ममता हो गयी है। आप कृपा करके स्वजनों के साथ जोड़े हुए इस स्नेह की दृढ़ फाँसी को काट दीजिये। श्रीकृष्ण ! जैसे गंगा की अखण्ड धारा समुद्र में गिरती रहती है, वैसे ही मेरी बुद्धि किसी दूसरी ओर न जाकर आपसे ही निरंतर प्रेम करती रहे।
श्रीकृष्ण ! अर्जुन के प्यारे सखा, यदुवंशशिरोमणे ! आप पृथ्वी के भाररूप राजवेशधारी दैत्यों को जलाने के लिए अग्निरूप है। आपकी शक्ति अनन्त है। गोविन्द ! आपका यह अवतार गौ, ब्राह्मण और देवताओं का दुःख मिटाने के लिए ही है। योगेश्वर ! चराचर के गुरु भगवन् ! मैं आपको नमस्कार करती हूँ।
(श्रीमद् भागवतः 1.8.18.43)
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